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पुर्वान्चल फ़िल्म डेवलपमेन्ट एसोसियेशन
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गोरखपुर में खुलेगी पूर्वाचल कला अकादमी
कार्यालय संवाददाता, गोरखपुर : खुशखबरी। अब गोरखपुर में पूर्वांचल कला अकादमी के खुलने की उम्मीद परवान चढ़ने लगी है। संस्कृति मंत्री सुभाष पाण्डेय ने स्वयं इस मामले में पहल करने का आश्र्वासन दिया है। अब वर्षो पुराना पूर्वाचल के रंगकर्मियों का सपना पूरा होने की उम्मीद जग गयी हैं। अकादमी खुल जाने से जहां यहां के कलाकारों को नियमित प्रशिक्षण की सुविधा मिल जायेगी और उनकी कला का परिमार्जन विशेषज्ञों की देख-रेख में होने लगेगा। वहीं नियमित थियेटर महानगर के रंगमंचीय संस्कृति को और समृद्ध व पुख्ता करेगा। यहां के कलाकारों, चित्रकारों, रंगकर्मियों और उनके सांस्कृतिक क्रिया कलापों को संरक्षित करने के लिए गोरखपुर में कोई माकूल जगह नहीं है। सभी बिखरे-बिखरे हैं। हकीकत यह है कि पूर्वाचल अपने कला के विभिन्न आयामों, चित्रकला, वास्तु कला, नृत्य कला, सभी विधाओं से सम्बन्धित अभिलेख, नाटय कला एवं गीत-साहित्य का विशाल भण्डार समेटे हुए है। उच्च शिक्षा में विभागीय स्तर पर भी उक्त सभी सांस्कृतिक धरोहर संग्रहीत नहीं है। रंगकर्मियों और कलाकारों को यह बात सालती रहती है। जागरण से हुई बातचीत में जब संस्कृति मंत्री को कला अकादमी की जरूरत के बारे में बताया गया तो वह गंभीर हो गये। फिर उन्होंने कहा कि यह कठिन नहीं है। इसके लिए सार्थक पहल करेंगे। उन्होंने डा.राजीव केतन से इस बारे में डिटेल जानकारी भी मांगी। कहा कि अध्ययन और मनन करने के बाद अगली कार्यवाही के लिए अधिकारियों से बातचीत की जायेगी। इतने बड़े प्रस्ताव के लिए भूमि की जरूरत पड़ेगी। कमिश्नर से भी बात करेंगे। यदि कोई अड़चन आया तो उसे भी देखा जायेगा। उन्होंने कहा कि जब यहां के कलाकार चाहेंगे, हम और आप साथ-साथ कोशिश करेंगे, तो कार्य आसान हो जायेगा।
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स्रोत:-दैनिक जागरण
12:46:08 pm 11 - Sep - 2010
इन्सेफेलाइटिस: मेडिकल कालेज में खुलेगा होम्योपैथ शोध केन्द्र
कार्यालय प्रतिनिधि, गोरखपुर: पूर्वाचल में इन्सेफेलाइटिस से हो रही मौतें बेहद दु:खद हैं। इनको किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिये। होम्योपैथ दवाएं इन्सेफेलाइटिस की रोकथाम व इलाज में काफी कारगर साबित हुई हैं। इसी को देखते हुए बीआरडी मेडिकल कालेज में भी इन्सेफेलाइटिस शोध केन्द्र स्थापित किया जा रहा है। यह बातें प्रदेश के होम्योपैथिक चिकित्सा राज्य मंत्री राजेश त्रिपाठी ने बीआरडी मेडिकल कालेज में सोमवार से पत्रकारों से बातचीत तथा मेडिकल कालेज व स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों तथा चिकित्सकों के साथ आयोजित बैठक में कही। उन्होंने कहा कि प्रयोग के तौर पर यहां भर्ती इन्सेफेलाइटिस के आधे मरीजों को एलोपैथ के साथ ही होम्योपैथ की दवाएं भी दी जायेंगी। बाद में अध्ययन कर देखा जायेगा कि होम्योपैथ दवाएं कितनी कारगर हैं। उन्होंने कहा कि वह प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा तथा महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा से भी शोध केन्द्र के लिये स्थान उपलब्ध करने के लिये वार्ता करेंगे। उम्मीद है कि अक्टूबर तक केन्द्र स्थापित हो जायेगा।श्री त्रिपाठी ने कहा कि वर्ष 1978 से हम जापानी इन्सेफेलाइटिस से जूझ रहे हैं। अब जलजनित इन्सेफेलाइटिस का भी कहर है। उन्होंने होम्योपैथ की चर्चा करते हुए कहा कि आन्ध्रप्रदेश में होम्योपैथ दवाओं से ही जापानी इन्सेफेलाइटिस को पूरी तरह काबू में कर लिया गया है। वहां की सरकार ने इस चिकित्सा पद्धति को अपनाया। गांवों में लोगों को इन्सेफेलाइटिस से बचाव की तीन खुराकें दी गयीं। नतीजा हुआ कि वर्ष 2004 के बाद वहां जापानी इन्सेफेलाइटिस के मरीज नहीं आये हैं। उन्होंने कहा कि जब आन्ध्र प्रदेश में रोकथाम हो सकता है जो फिर पूर्वाचल में क्यों नहीं? अब पूर्वाचल में प्रयोग के तौर पर होम्योपैथिक दवाओं का इन्सेफेलाइटिस से बचाव व इलाज में प्रयोग किया जायेगा। प्रयोग के तौर पर कुशीनगर व देवरिया का पहले दवाएं दी जाएंगी। बाद में दूसरे जिलों को चयनित किया जायेगा। इस अवसर पर भारत सरकार के उप निदेशक होम्योपैथी डा. विक्रम सिंह ने भी होम्योपैथ दवाओं को इन्सेफेलाइटिस के इलाज में कारगर बताया। मेडिकल कालेज के बाल रोग के विभागाध्यक्ष डा. के.पी. कुशवाहा ने कहा कि यदि होम्योपैथ दवाएं आईसीएमआर, होम्योपैथ काउन्सिल तथा लैब से स्वीकृत हो जाती हैं तो मेडिकल कालेज में उनके प्रयोग में हर्ज नहीं है। सीएमओ डा. आर.एन. मिश्र, डा. ए.के.ठक्कर, डा. राजीव मिश्र, डा. डी.के. श्रीवास्तव, डीपीओ डा. आर.एन. सिंह, नेहरू अस्पताल के एसआईसी डा. ए.के. श्रीवास्तव आदि मौजूद थे। बाद में श्री त्रिपाठी ने एपेडमिक वार्ड का दौरा किया जहां इन्सेफेलाइटिस मरीज भर्ती है। यहां मरीजों में श्री त्रिपाठी ने दवाएं नहीं मिलने तथा अव्यवस्था की शिकायत की।
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स्रोत:-दैनिक जागरण
10:24:46 am 31 - Aug - 2010
संसद में फिर गूंजा भोजपुरी को 8वीं अनुसूची में लाने का मामला
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली : भोजपुरी व राजस्थानी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने को लेकर लोकसभा में सभी पक्षों की तरफ से जोरदार मांग की गई। गृह राज्य मंत्री अजय माकन ने कहा कि सरकार इस मुद्दे पर गंभीर है। वह सूर्यकांत महापात्र कमेटी की सिफारिशों पर विचार कर रही है और जो भी फैसला होगा उसे सदन के सामने लाया जाएगा। इसके पहले सदस्यों को शांत करते हुए सदन के नेता प्रणव मुखर्जी ने कहा कि अभी सरकार न तो इसे स्वीकार कर सकती है और न ही नकार सकती है। लोकसभा में इस मामले पर ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर हुई चर्चा में कांग्रेस के संजय निरुपम, राजद के रघुवंश प्रसाद सिंह व कांग्रेस जगदंबिका पाल ने कहा कि जिस भोजपुरी भाषा को बोलने वाले 18 करोड़ लोग हैं, और जो भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों में बोली जाती है। इस भाषा में साहित्य भी लिखा गया है और इसका व्याकरण व लिपि भी है। इसके बावजूद इसे सरकारी सहायता नहीं मिलती है। सरकार इसे टाले नहीं और कोई समय सीमा तय करे। इन सांसदों ने इसके साथ राजस्थानी भाषा को भी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की।
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स्रोत:-दैनिक जागरण
10:05:31 am 31 - Aug - 2010
हर सरकार ने की किन्नरों की उपेक्षा
गोला, बड़हलगंज : आजादी के चौसठ साल बाद भी किन्नरों को संवैधानिक हक नहीं मिल पाया है। आज भी समाज में किन्नर केवल नाच-गाने और मनोरंजन की विषय-वस्तु है। अशिक्षित और उपेक्षित किन्नर भीख मांगने, नाचना-गाना या इससे सम्बन्धित अन्य कार्यो में ही लगे हुए है। अपने ही देश में किन्नर अधिकार विहीन और समाज के लोगो की उपेक्षा के शिकार है। आखिर इसमें इनका क्या दोष है? प्रदेश और केन्द्र सरकारों ने सदैव किन्नरों की उपेक्षा की है। उक्त बातें उरूवा ब्लाक के भीटा गांव निवासी किन्नर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने गोला में आयोजित एक पत्रकार वार्ता में कही। उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है महाभारत काल में सेनापति रहे शिखण्डी ने अपने कला-कौशल के बल पर युद्ध की दिशा ही बदल दी। मध्यकाल में अलाउद्दीन खिलजी के किन्नर सेनापति मलिक काफूर ने अकेले ही पूरा दक्षिण विजय कर डाला। आधुनिक काल में प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान बहादुर शाह जफर के साथ पांच सौ से अधिक देश भक्त किन्नर भारत माता की गुलामी की बेडि़यां तोड़ने के लिए शहीद हो गए। हम किन्नरों के पास खोने के लिए तो कुछ भी नहीं है। न घर है और न परिवार। फिर हमसे अच्छा इस देश की सेवा कौन कर सकता है। इसलिए हमें भी देश सेवा का अवसर अवश्य मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि सेना व पुलिस समेत सभी नौकरियों में किन्नरों को स्थान मिलना चाहिए। एक सवाल के जबाब में उन्होंने कहा कि वह किन्नरों के लिए अलग से आरक्षण की मांग नहीं करते, क्योंकि आरक्षण व्यक्ति को कमजोर बनाता है और अपने हित के लिए राजनीतिज्ञों द्वारा दुरूपयोग किया जाता है। फिर भी सरकार को चाहिए कि इस उपेक्षित समाज को मुख्य धारा में लाने के बारे में सोचे। मालूम हो कि श्री त्रिपाठी विश्र्व के पहले किन्नर है जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ की जनरल एसेम्बली एवं प्रेसिडेन्ट आफिस में किन्नर समाज का प्रतिनिधित्व किया है।
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शशिमौली त्रिपाठी
08:42:13 am 25 - Aug - 2010
रोटी का मोहताज पैरा ओलम्पियन
विश्वनाथ सिंह, देवरिया विकलांग राजबली को रोटी की जंग भारी पड़ रही है। विकलांगों के लिए आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं और पैरा ओलम्पिक में उन्होंने देश के लिए कई पदक जीते हैं। दुनिया भर में उनकी जीत का डंका बजा मगर अब खुद को हारा महसूस करते हैं। उन्हें कोई हाकिम पूछता नहीं। लखनऊ तक भटकने के बाद अपने गांव आकर बैठ गये हैं। वे कहते हैं कोई उनके मेडल खरीद ले। इनका क्या मतलब जब रोटी के भी लाले है। पूरी जवानी देश के लिए पदक जीतने में खपाने वाले राजबली रुद्रपुर के ग्राम पिपरा कछार के निवासी हैं। चार वर्ष की अवस्था में दोनों पैर ट्रेन दुर्घटना में कट गये। मगर इन्होंने पैर न होने को कमजोरी नहीं माना। स्कूल के दिनों में ही तैराकी व कुश्ती में महारत हासिल की । 1980 में नेशनल डिसएब्लड गेम लखनऊ में क्रिकेट बाल फेंकने में प्रथम पुरस्कार अर्जित किया। इसके बाद उनकी जीत का सिलसिला शुरू हो गया। नाना बाई स्टेडियम कानपुर में तैराकी में प्रथम, के.डी.सिंह स्टेडियम में गोला क्षेपण में द्वितीय, लखनऊ में जबलिंग थ्रो प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान हासिल किया। इसके बाद राजबली ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इन्हें जापान में आयोजित डिसएब्लड गेम्स में अपना जलवा बिखेरने का मौका मिला। वर्ष 1981 में जापान से तैराकी एवं साठ फीट गोला क्षेपण में दो स्वर्ण जीतकर देश लौटे। वर्ष 1982 में हांगकांग जाने का मौका मिला। यहां इन्होंने तैराकी की बैक स्ट्रोक प्रतिस्पर्धा में स्वर्ण तैराकी फ्री स्टाइल, गोला क्षेपण में रजत पदक हासिल किया।1982 में ही व्हील चेयर रेस हांगकांग में इन्हें कांस्य पदक मिला। उन्होंने विभिन्न प्रतियोगिताओं में कुल दस स्वर्ण,चार रजत, एक कांस्य पदक जीता। पर इतनी उपलब्धियों की खुशी रोटी जुटाने में काफूर हो जाती है। बुढ़ापे में उन्हें और उनकी पत्‍‌नी श्रीमती बलवंती देवी को बच्ची नेहा की परवरिश भारी पड़ रही है। इसके बावजूद राजबली आठ माह पूर्व मीठाबेल में मिली एक नवजात बच्ची की परवरिश भी कर रहे हैं।
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स्रोत:-दैनिक जागरण
11:02:15 am 29 - Jul - 2010
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