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भाषा व संस्कृति
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भोजपुरी को बनाना चाहता हूं ज्ञान-विज्ञान का संवाहक
गोला, बड़हलगंज : भोजपुरी समृद्ध भाषा है। यह पूर्वाचल वासियों की लैंगुआ फ्रैंका है। फिर भी इस भाषा में साहित्य व ज्ञान-विज्ञान सम्बन्धी विषयों की रचना कम हुई है। हमारी यह मातृ भाषा है, इसलिए इसको मैं ज्ञान-विज्ञान का संवाहक बनाना चाहता हूं जिससे यह भाषा दीर्घजीवी बनी रहे। यह कहना है गोला विकास खण्ड के मन्नीपुर गांव निवासी एवं भारत सरकार द्वारा शिक्षा पुरस्कार से नवाजे गए डा. श्रवण कुमार तिवारी का। सम्प्रति श्री तिवारी काशी हिन्दू विश्र्वविद्यालय के भौतिकी कक्ष में सहायक निदेशक पद से अवकाश ग्रहण करने के बाद विज्ञान की पुस्तकों के लेखन में लगे हुए है। उनकी पुस्तक लेजर और उसका उपयोग को भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत भी किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त दो दर्जन से अधिक पुस्तकों के लेखन और अनुवाद और लगभग पांच दर्जन पत्र-पत्रिकाओं में मौलिक लेखों का प्रकाशन भी हो चुका है। भारत सरकार के अतिरिक्त विज्ञान परिषद प्रयाग द्वारा इनको हिव्टेकर तथा विज्ञान-वाचस्पति सम्मान भी मिल चुका है। इनकी सर्वाधिक ख्याति इनके द्वारा रचित विज्ञान कथा सागर नामक पुस्तक से हुई। जिसे इन्होंने महाकवि तुलसीदास की तरह विज्ञान को दोहा, चौपाई और छंदों में प्रस्तुत किया है। जागरण से बातचीत में वे कहते हैं कि उनकी आरंभिक शिक्षा मिडिल स्कूल गोला तथा मैट्रिक की डिग्री स्थानीय वी एस ए वी इण्टर कालेज से प्राप्त की। उच्च शिक्षा एवं शोध काशी हिन्दू विश्र्वविद्यालय से किया। अस्सी वर्षीय श्री त्रिपाठी कहते हैं कि इतना कुछ लिखने-पढ़ने के बाद भी भोजपुरी में मौलिक लेखन न कर पाने की कसक रह गई है। मैं भोजपुरी में भी विज्ञान के विभिन्न गूढ़ रहस्यों को प्रस्तुत करना चाहता हूं जिससे यह भाषा भी अन्य समृद्ध भाषाओं की तरह ज्ञान-विज्ञान एवं साहित्य का पीढ़ी दर पीढ़ी संवाहक बन सके।
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शशिमौली त्रिपाठी
08:15:09 am 25 - Aug - 2010
भोजपुरी भाषा को भी मिले संवैधानिक मान्यता
वाराणसी। भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के अभियान पर निकले दिल्ली पश्चिमी के सांसद महाबल मिश्रा इन दिनों पूर्वांचल के दौरे पर हैं। सांसद इसके लिए लोगों से सहयोग की अपील कर रहे हैं। सैयदराजा में एक जनसभा करने के बाद सांसद ने रविवार को मैदागिन स्थित पराड़कर भवन में अखबारनवीसों से बातचीत के दौरान अभियान की जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि भोजपुरी को यथोचित सम्मान मिलना ही चाहिए। लोकसभा चुनाव जीतने के बाद श्री मिश्रा ने भोजपुरी में ही शपथ ली थी। उनका कहना था कि नेपाली और सिंधी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया गया जबकि देश में 18 करोड़ लोग जिस भोजपुरी के माध्यम से आपसी बोलचाल करते हैं, वह अब तक उपेक्षित है। उन्होंने बताया कि पूर्वांचल के लोग अपनी मेहनत के बदौलत देश के कोने कोने में कमाई कर रहे हैं बावजूद इसके उन पर अत्याचार किया जा रहा है। न उन्हें राशन कार्ड दिया जाता और न ही पहचान पत्र। इसीलिए भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा देने के लिए अभियान चलाया जा रहा है।
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editor
03:16:08 am 03 - May - 2010
इग्नू ने बढ़ाया भोजपुरी भाषा का गौरव
गोरखपुर : भोजपुरी भारत वर्ष के करीब 50 हजार वर्गमील से जुड़े भू-भाग में बसने वाले लोगों की मातृभाषा है। भोजपुरी बिहार, उप्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखण्ड के करीब 20 करोड़ लोगों की बोली है। दुनिया के 17 देशों में भोजपुरी बोली जाती है। मारीशस में तो इसे दूसरी भाषा का दर्जा हासिल है। मातृभाषा हिन्दी के बाद क्षेत्रफल और आबादी के अनुसार भोजपुरी का ही नंबर आता है। इसीके मद्देनजर इग्नू ने भोजपुरी आधारित पाठ्यक्रम का निर्माण कर अध्ययन शुरु किया है। यह जानकारी इग्नू के गोरखपुर विश्र्वविद्यालय के समन्वयक डा. रजनीकांत पाण्डेय ने दी है। बकौल डा. पाण्डेय भोजपुरी अपनी सहजता सरलता और अन्य खूबियों के कारण भोजपुरी का सीमा क्षेत्र का लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में भोजपुरी भाषा पर पाठ्यक्रम बनाने की इग्नू की योजना बहुत ही महत्वपूर्ण है। आदिकाल से समृद्ध साहित्य से परिपूर्ण इस भाषा में इग्नू ने भोजपुरी में आधार पाठ्यक्रम का निर्माण किया। यह आधार पाठ्यक्रम कला, पर्यटन, विज्ञान, समाज कार्य में स्नातक कार्यक्रमों में उपलब्ध है। इग्नू की यह ऐतिहासिक पहल भोजपुरी भाषियों के लिए एक उम्मीद जैसी है। डा. पाण्डेय ने कहा है कि जब रूसी, जापनी, चीनी, फ्रेंच, रोमेनियन भाषाओं में जीवन के सभी क्षेत्रों में उन्नति सम्बंधी कार्य हो सकता है तो इतनी बड़ी संख्या में बोली जाने वाली भाषा भोजपुरी में ये सब क्यों नहीं?
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editor
03:08:08 am 19 - Apr - 2010
आजादी के 61 वर्ष बाद सांस्कृतिक धरोहर
भारत की संस्कृति देश के इतिहास से जुड़ी हुई है। भारत का ऐतिहासिक स्मारक ‘ताजमहल’ विश्व की प्रसिद्ध इमारतों में से एक है। अब यह इमारत शाहजहाँ के राजवंश का प्रतीक मात्र रह गई है। अनेक राजा, महाराजा तथा राजवंशज विभिन्न ऐतिहासिक स्मारक अपने प्रतीक के रूप में छोड़ गए हैं।

भारत में दो प्रकार की सांस्कृतिक धरोहर हैं। पहला है भौतिक धरोहर, जिसे स्पर्श कर सकते हैं। और दूसरी है अदृश्य धरोहर, जिसे हम देख नहीं सकते, सुन नहीं सकते लेकिन इतिहास उसे बयाँ करता है। हज़ारों वर्षों से भारत में अनमोल ऐतिहासिक स्थल हैं। 1972 में यूनेस्को ने विश्व की सांस्कृतिक तथा प्राकृतिक धरोहरों की सुरक्षा के लिए नियम बनाया था।

भारत सरकार के नियमों के तहत धारा 49 के अनुसार हर राज्य सरकार को हर स्मारक, स्थान तथा ऐतिहासिक वस्तु की रक्षा करनी चाहिए। अनेक स्मारकों एवं वस्तुओं को भारत सरकार ने राष्ट्रीय सांस्कृतिक महत्ता दी है। धारा 51 (अ) में लिखा गया है कि हर भारतीय नागरिक का कर्तव्य है कि वह भारत की सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करे।

इमारतों के प्रति इंसानी बर्बरता के कारण स्मारक गायब होते जा रहे हैं। भारत में इमारतों के लुप्त हो जाने का एक और कारण यह है कि पुरानी इमारतों को तोड़कर नई इमारतें बनाई जा रही हैं। भारत में सातवीं सदी में कश्मीर पर आक्रमण किया गया था।
सन् 2007 में यूनेस्को ने घोषित किया कि विश्व में 830 सांस्कृतिक धरोहर हैं उनमें से 27 भारत में हैं। सन् 1983 में भारत में स्थित अजंता-एलोरा तथा ताजमहल को विश्व की प्रथम सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया गया। खजुराहो के स्मारक, साँची के बौद्ध मठ, हुमायूँ का मकबरा भी प्रसिद्ध हैं। 2007 में यूनेस्को ने लाल किले को भी ऐतिहासिक स्मारक घोषित किया।

कहा जाता है कि भारत के संग्रहालय प्राकृतिक परिवेश से ओत-प्रोत हैं। भारतीय संग्रहालय तथा नेशनल पुस्कालय के पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर श्यामल कांती गांगुली ने बताया कि सांस्कृतिक धरोहर के विनाश होने के दो कारण हैं। कई सालों से भारत की ऐतिहासिक इमारतों पर भारी वर्षा, कड़ी धूप तथा तेज हवाओं के कारण इन स्मारकों में विभिन्न प्रकार की समस्याएँ उभर रही हैं। कहीं दीवार में दरार पड़ रही है तो कहीं इमारतों की छतें ध्वस्त हैं।

इमारतों के प्रति इंसानी बर्बरता के कारण स्मारक गायब होते जा रहे हैं। भारत में इमारतों के लुप्त हो जाने का एक और कारण यह है कि पुरानी इमारतों को तोड़कर नई इमारतें बनाई जा रही हैं। भारत में सातवीं सदी में कश्मीर पर आक्रमण किया गया था।

अँग्रेजों ने अपने शासन के दौरान भारत के स्मारकों में परिवर्तन लाने का व्यापक प्रयास किया था। लॉर्ड बैंटिक ने भी मुगल गार्डन में परिवर्तन लाने की कोशिश की थी। हड़प्पा तथा मोहन जोदड़ो के ऐतिहासिक अंश से मुल्तान, लाहौर तथा राजस्थान के रेलमार्ग निर्मित किए गए थे। साँची स्तूप के स्तम्भ पत्थरों को धोबी कपड़े धोने में प्रयोग करते थे। पर्यावरण में अधिक मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड होने के कारण ताजमहल पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। कुछ पर्यटकों ने जाने-अनजाने में इन स्मारकों पर दाग अंकित किए हैं। कई मंदिरों से भगवान की प्रतिमाएँ चुराई गई हैं तो कई बार उन्हें नुकसान भी पहुँचाया है।

स्मारकों को पहुँची इस हानि के लिए हम किसको जिम्मेदार समझें? सरकार को या आम इंसान को। सरकार द्वारा सांस्कृतिक धरोहरों को सुरक्षित रखने के लिए बनाए गए नियम पर्याप्त नहीं हैं। देखा गया है कि आम आदमी में इन ऐतिहासिक समारकों के प्रति कोई जागरूकता नहीं है। जितने भी नियम बनाए गए हैं तथा जितने भी सम्मेलन आयोजित किए गए हैं, सब विफल रहे हैं।

क्योंकि इन नियमों से भारतीय जनता अनभिज्ञ है। चाहे वह व्यक्ति शिक्षित हो या अशिक्षित, सरकारी तथा गैर-सरकारी संगठनों को मिलकर लोगों में ऐतिहासिक स्थलों के प्रति जागरूकता बढ़ाना होगी। इंडियन नेशन ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरीटेज (इनटैक) तथा इकोमोस जैसे गैर-सरकारी संस्थानों को बढ़ावा देना चाहिए। इस कदम से भारत की सांस्कृतिक तथा प्राकृतिक धरोहर सुरक्षित हो सकती है।
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dharamendra kumar pandey
10:52:32 am 14 - Mar - 2010
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