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साहित्य व इतिहास
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महोत्सव है स्वतंत्रता दिवस - रवि किशन
१५ अगस्त यानी की भारत वर्ष की आजादी का दिवस. सबको पता है की इसी तारीख को १९४७ में हमें अंग्रेजो की गुलामी से मुक्ति मिली थी . इसी दिन से पूरे देश वासियों ने खुली हवा में मेरा मतलब है अपनी हवा में सांस लेना शुरू किया था. अब आपको लग रहा होगा की हवा कैसे किसी का गुलाम हो सकता है. सही है लेकिन जब पूरा देश गुलामी की जंजीर से जकड़ा हो ..देश का प्रत्येक नागरिक गुलाम हो तो उससे जुडी हर चीज़ पर गुलामी का ग्रहण लग जाता है. ऐसा ग्रहण जिसकी मुक्ति के लिए हम छटपटाते रहते हैं, और जब आज़ादी मिलती है तो हर चीज़ अपनी लगने लगती है. ऐसा ही हुआ था इस दिन साल १९४७ को. मुझे याद है मेरा बचपन - उत्तरप्रदेश के जौनपुर जिले के केराकत तहसील के मेरे गाँव विसुई का वो गड्खारा प्राथमिक विद्यालय जहां होश सँभालते ही मैंने खुद को वहाँ पाया था. १५ अगस्त के काफी दिन पहले से ही तैयारी शुरू हो जाती थी. वो जमाना रेडियो का जमाना था. कुछ दिन पहले से ही देशभक्ति गाने बजने शुरू हो जाते थे. उस समय बिल्कुल अबोध था . लगता था दसहरा , दीवाली की तरह कोई त्यौहार आने वाला है. मुझे याद है मेरे स्कूल का मेरा पहला स्वतंत्रता दिवस . बाबु जी ने अपने पूजा करने के वक़्त ही मुझे और मेरे भाई बहनों को जगा दिया. माई ने हमलोगों को तैयार कराया . सफ़ेद पायजामा कुरता पहन कर स्कूल पंहुचा , वहां प्रभात फेरी की तैयारी चल रही थी. बच्चो का हुजूम था , फिर शुरू हुआ प्रभात फेरी....भारत माता की जय... महात्मा गाँधी अमर रहे के उदघोष के साथ हम पूरे गाँव की गलियों में राष्ट्रभक्ति की अलख जागते हुए स्कूल पहुचे जहाँ तिरंगा फहराया गया. मेरे लिए बिलकुल नया अनुभव था ....मुझे न तो ये पता था की महात्मा गाँधी कौन थे न ही ये पता था की ये हो क्या रहा है.. बस अच्छा लगा था वो जलेवी जो तिरंगा फहराने के बाद हम बच्चो को मिला था. दिन बीतता गया और सुबह का उजियारा जिस तरह प्रकाश का रूप धारण करता है उसी तरह मेरा ज्ञान भी बढ़ता गया और कुछ ही साल मैं अपने देश की आजादी और उससे जुड़े महापुरुसो का त्याग पढ़कर फ़ौज में जाने की बात सोचने लगा, लेकिन मेरे अन्दर छुपे कलाकार ने मेरी उस असीम इच्छा को दबा दिया . खैर मुझे इस बात का संतोष है की मैं मनोरन्जन के माध्यम से अपने देश की सेवा कर रहा हूँ. अभी हाल ही में मैं पटना गया था अपने फिल्म जरा देब दुनिया तोहरा प्यार में के प्रोमोशन के लिए. आरा से पटना आने के क्रम में दानापुर केंट में अचानक कुछ फौजी भाइयो ने मेरी गाडी रोक दी और मुझे बैरक में ले गए . उन लोगो के साथ मैंने पूरे एक घंटे बिताये, सच पूछिए तो काफी मजा आया. वैसे हिंदी फिल्म १९७१ और भोजपुरी फिल्म आपन माती आपन देश में मैंने किस किरदार को जिया है. खैर आज स्वतंत्रता दिवस है , मेरा तो यही मानना है हम इसे छुट्टी के दिन के रूप में ना मनाये जैसा की हमारे सभ्रांत वर्ग मानते हैं. इस दिन अगर एक ज़रूरतमंद की सेवा कर दें तो स्वतंत्रता दिवस का सही मकसद पूरा हो जायेगा. अंत में आजादी के लिए अपनी जान की बाजी लगा देने वाले और आज हमारी रक्षा के लिए जान हथेली पर रख कर अपने परिवार से दूर रहने वाले अपने जवानो को शत शत नमन ... और अपने भाई बहनों को यही कहूँगा जिसे कहकर लता ताई ने अपने देश के पहले प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु की आँखों में भी आंसू ला दिया था.... ए मेरे बतन के लोगो जरा आँख में भर लो पानी ..जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी.. जय हिंद ... आपका रवि किशन
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उदय भगत
08:14:28 am 29 - Aug - 2010
अयोध्या में कब-कब क्या हुआ
अयोध्या विवाद भारत के हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच तनाव का एक प्रमुख मुद्दा रहा है और देश की राजनीति को एक लंबे अरसे से प्रभावित करता रहा है.

भारतीय जनता पार्टी और विश्वहिंदू परिषद सहित कई हिंदू संगठनों का दावा है कि हिंदुओं के आराध्यदेव राम का जन्म ठीक वहीं हुआ जहाँ बाबरी मस्जिद थी.

उनका दावा है कि बाबरी मस्जिद दरअसल एक मंदिर को तोड़कर बनवाई गई थी और इसी दावे के चलते छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरा दी गई.

इसके अलावा वहाँ ज़मीन के मालिकाना कब्ज़े का विवाद है.

मामले-मुक़दमे अदालतों में चल रहे हैं और इस बीच लिब्राहन आयोग ने अपनी रिपोर्ट दे दी है.

जानिए अयोध्या में कैसे घूमा है समय का पहिया पिछली पाँच सदियों में.

1528: अयोध्या में एक ऐसे स्थल पर एक मस्जिद का निर्माण किया गया जिसे कुछ हिंदू अपने आराध्य देवता राम का जन्म स्थान मानते हैं. समझा जाता है कि मुग़ल सम्राट बाबर ने यह मस्जिद बनवाई थी जिस कारण इसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था.

हिंदू उस जगह पर राम मंदिर बनाना चाहते हैं

1853: पहली बार इस स्थल के पास सांप्रदायिक दंगे हुए.

1859: ब्रितानी शासकों ने विवादित स्थल पर बाड़ लगा दी और परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों को और बाहरी हिस्से में हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दे दी.
1949: भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गयीं. कथित रुप से कुछ हिंदूओं ने ये मूर्तियां वहां रखवाईं थीं. मुसलमानों ने इस पर विरोध व्यक्त किया और दोनों पक्षों ने अदालत में मुकदमा दायर कर दिया. सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित करके ताला लगा दिया.

1984: कुछ हिंदुओं ने विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में भगवान राम के जन्म स्थल को \\\"मुक्त\\\" करने और वहाँ राम मंदिर का निर्माण करने के लिए एक समिति का गठन किया. बाद में इस अभियान का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी के एक प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संभाल लिया.
1986: ज़िला मजिस्ट्रेट ने हिंदुओं को प्रार्थना करने के लिए विवादित मस्जिद के दरवाज़े पर से ताला खोलने का आदेश दिया. मुसलमानों ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन किया.

1989: विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर निर्माण के लिए अभियान तेज़ किया और विवादित स्थल के नज़दीक राम मंदिर की नींव रखी.
1990: विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद को कुछ नुक़सान पहुँचाया. तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने वार्ता के ज़रिए विवाद सुलझाने के प्रयास किए मगर अगले वर्ष वार्ताएँ विफल हो गईं.

1992: विश्व हिंदू परिषद, शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया. इसके परिणामस्वरूप देश भर में हिंदू और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे जिसमें 2000 से ज़्यादा लोग मारे गए.
1998: प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने गठबंधन सरकार बनाई.

2001: बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी पर तनाव बढ़ गया और विश्व हिंदू परिषद ने विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण करने के अपना संकल्प दोहराया.

हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने छह दिसंबर, 1992 को विवादित ढाँचा गिरा दिया था

जनवरी 2002: अयोध्या विवाद सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री वाजपेयी ने अयोध्या समिति का गठन किया. वरिष्ठ अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को हिंदू और मुसलमान नेताओं के साथ बातचीत के लिए नियुक्त किया गया.

फ़रवरी 2002: भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए अपने घोषणापत्र में राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को शामिल करने से इनकार कर दिया. विश्व हिंदू परिषद ने 15 मार्च से राम मंदिर निर्माण कार्य शुरु करने की घोषणा कर दी. सैकड़ों हिंदू कार्यकर्ता अयोध्या में इकठ्ठा हुए. अयोध्या से लौट रहे हिंदू कार्यकर्ता जिस रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे थे उस पर गोधरा में हुए हमले में 58 कार्यकर्ता मारे गए.
13 मार्च, 2002: सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फ़ैसले में कहा कि अयोध्या में यथास्थिति बरक़रार रखी जाएगी और किसी को भी सरकार द्वारा अधिग्रहीत ज़मीन पर शिलापूजन की अनुमति नहीं होगी. केंद्र सरकार ने कहा कि अदालत के फ़ैसले का पालन किया जाएगा.

15 मार्च, 2002: विश्व हिंदू परिषद और केंद्र सरकार के बीच इस बात को लेकर समझौता हुआ कि विहिप के नेता सरकार को मंदिर परिसर से बाहर शिलाएं सौंपेंगे. रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत परमहंस रामचंद्र दास और विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक सिंघल के नेतृत्व में लगभग आठ सौ कार्यकर्ताओं ने सरकारी अधिकारी को अखाड़े में शिलाएं सौंपीं.
22 जून, 2002: विश्व हिंदू परिषद ने मंदिर निर्माण के लिए विवादित भूमि के हस्तांतरण की माँग उठाई.

जनवरी 2003: रेडियो तरंगों के ज़रिए ये पता लगाने की कोशिश की गई कि क्या विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद परिसर के नीचे किसी प्राचीन इमारत के अवशेष दबे हैं, कोई पक्का निष्कर्ष नहीं निकला.
मार्च 2003: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से विवादित स्थल पर पूजापाठ की अनुमति देने का अनुरोध किया जिसे ठुकरा दिया गया.

अप्रैल 2003: इलाहाबाद हाइकोर्ट के निर्देश पर पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने विवादित स्थल की खुदाई शुरू की, जून महीने तक खुदाई चलने के बाद आई रिपोर्ट में कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकला.
मई 2003: सीबीआई ने 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी सहित आठ लोगों के ख़िलाफ पूरक आरोपपत्र दाखिल किए.

जून 2003: काँची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने मामले को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की और उम्मीद जताई कि जुलाई तक अयोध्या मुद्दे का हल निश्चित रूप से निकाल लिया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

हाईकोर्ट ने आडवाणी पर आपराधिक मुक़दमा चलाने की अनुमति नहीं दी है

अगस्त 2003: भाजपा नेता और उप प्रधानमंत्री ने विहिप के इस अनुरोध को ठुकराया कि राम मंदिर बनाने के लिए विशेष विधेयक लाया जाए.

अप्रैल 2004: आडवाणी ने अयोध्या में अस्थायी राममंदिर में पूजा की और कहा कि मंदिर का निर्माण ज़रूर किया जाएगा.
जुलाई 2004: शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे ने सुझाव दिया कि अयोध्या में विवादित स्थल पर मंगल पांडे के नाम पर कोई राष्ट्रीय स्मारक बना दिया जाए.

जनवरी 2005: लालकृष्ण आडवाणी को अयोध्या में छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस में उनकी कथित भूमिका के मामले में अदालत में तलब किया गया.
जुलाई 2005: पाँच हथियारबंद चरमपंथियों ने विवादित परिसर पर हमला किया जिसमें पाँचों चरमपंथियों सहित छह लोग मारे गए, हमलावर बाहरी सुरक्षा घेरे के नज़दीक ही मार डाले गए.

06 जुलाई 2005 : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के दौरान \\\'भड़काऊ भाषण\\\' देने के मामले में लालकृष्ण आडवाणी को भी शामिल करने का आदेश दिया. इससे पहले उन्हें बरी कर दिया गया था.
28 जुलाई 2005 : लालकृष्ण आडवाणी 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में गुरूवार को रायबरेली की एक अदालत में पेश हुए. अदालत ने लालकृष्ण आडवाणी के ख़िलाफ़ आरोप तय किए.

04 अगस्त 2005: फ़ैजाबाद की अदालत ने अयोध्या के विवादित परिसर के पास हुए हमले में कथित रूप से शामिल चार लोगों को न्यायिक हिरासत में भेजा.

लिब्रहान आयोग ने 17 सालों बाद अपनी रिपोर्ट सौंप दी है

20 अप्रैल 2006 : कांग्रेस के नेतृत्ववाली यूपीए सरकार ने लिब्रहान आयोग के समक्ष लिखित बयान में आरोप लगाया कि बाबरी मस्जिद को ढहाया जाना सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा था और इसमें भाजपा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, बजरंग दल और शिव सेना की \\\'मिलीभगत\\\' थी.

जुलाई 2006 : सरकार ने अयोध्या में विवादित स्थल पर बने अस्थाई राम मंदिर की सुरक्षा के लिए बुलेटप्रूफ़ काँच का घेरा बनाए जाने का प्रस्ताव किया. इस प्रस्ताव का मुस्लिम समुदाय ने विरोध किया और कहा कि यह अदालत के उस आदेश के ख़िलाफ़ है जिसमें यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए गए थे.
19 मार्च 2007 : कांग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने चुनावी दौरे के बीच कहा कि अगर नेहरू-गाँधी परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्री होता तो बाबरी मस्जिद न गिरी होती. उनके इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया हुई.

30 जून 2009: बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के मामले की जाँच के लिए गठित लिब्रहान आयोग ने 17 वर्षों के बाद अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी.
सात जुलाई, 2009: उत्तरप्रदेश सरकार ने एक हलफ़नामे में स्वीकार किया कि अयोध्या विवाद से जुड़ी 23 महत्वपूर्ण फ़ाइलें सचिवालय से ग़ायब हो गई हैं.

24 नवंबर, 2009: लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश. आयोग ने अटल बिहारी वाजपेयी और मीडिया को दोषी ठहराया और नरसिंह राव को क्लीन चिट दी.
20 मई, 2010: बाबरी विध्वंस के मामले में लालकृष्ण आडवाणी और अन्य नेताओं के ख़िलाफ़ आपराधिक मुक़दमा चलाने को लेकर दायर पुनरीक्षण याचिका हाईकोर्ट में ख़ारिज.

26 जुलाई, 2010: रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद पर सुनवाई पूरी.
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08:09:29 am 29 - Aug - 2010
सेवा भाव से दुनिया जीतने वाली मदर टेरेसा
जब यह दुनिया एक विश्व युद्ध झेल, दूसरे की तैयारी कर रही थी, जब यूरोप के दो खूंखार तानाशाह धरती को रक्त से लाल कर देना चाह रहे थे, तभी इसी यूरोप की छोटे से कद की एक महिला ने दुनिया बदल दी. मदर टेरेसा इसी बदलाव नाम हैं.


चार फुट दस इंच की मदर टेरेसा ने नीली पट्टी वाली सफेद साड़ी से वह कर दिखाया, जिसके सामने बड़े बड़े तानाशाहों ने घुटने टेक दिए. इस महिला ने अपनी जंग का अलग मैदान चुना. सड़कों के बीमार और लावारिस दम तोड़ते लोग और गुमनाम गुरबत से भरी झुग्गियों का मैदान. क्या जंग चली. क्या जीत मिली. लाख जोर लगाने पर भी पिछली सदी में मदर टेरेसा से ज्यादा लोकप्रिय शख्सियत जेहन में नहीं आता.

सिर पर छत न हो और कुष्ठ रोग से बदन गलने लगे, तो मरने का मन भले न करता हो, जीना भी अच्छा नहीं लगता होगा. लेकिन अगर कोई अपने हाथों से जख्मों को साफ करे, उन पर पट्टी लगाए. खाना खिलाए और रहने को छत भी दे दे, तो शायद जिन्दगी में कुछ रस आ सकता है. अंधेरी बंद सुरंग में रोशनी की तरह.

भारत में यह रोशनी बहुत दूर से आई थी. मैसिडोनिया के स्कोप्जे शहर से. अलबेनियाई मूल की उन्नीस साल की एक नन एगनस यूं तो लॉरेटो कॉन्वेंट में पढ़ाने के लिए भारत पहुंची लेकिन बीस साल बाद उसे समझ आया कि उसकी दुनिया तो कहीं और बसती है. सड़कों पर, झुग्गियों में, गरीबों में. लाचारों में. ईसाइयों के सबसे बड़े चर्च वैटिकन ने उसे उसकी दुनिया दे दी. यह पहली और इकलौती मिसाल है, जब वैटिकन ने किसी नन को बंद कमरों से बाहर रहने की इजाजत दी, उसे अपना अलग ऑर्डर शुरू करने की अनुमति दी.
1950 में शुरू हुआ यह सिलसिला अब भी चल रहा है. मिशनरी ऑफ चैरिटीज को दुनिया भले ही ईसाई धर्म से जुड़ी संस्था माने लेकिन ऐसा है नहीं. मदर टेरेसा की महानता ने इसे ऐसा नहीं बनने दिया. सड़कों पर मिले बीमारों की तीमारदारी करने से पहले वह उनका मजहब नहीं पूछती थीं, भूखों को दो निवाले देने से पहले उनकी जाति नहीं पूछी जाती और न ही दम तोड़ते गरीब को सड़क से उठा कर होमलेस होम में लाते हुए उससे पूछा जाता कि उसका नाम सिंह है, खान या जेम्स.

नीली पट्टी वाली सफेद साड़ी में लिपटा वह शरीर याद आता है, जिसकी पीठ झुक गई थी. लेकिन जिसके चेहरे पर बला का तेज था. शांति थी. एक मां तो सिर्फ अपने बच्चे से प्यार कर सकती है. इसने तो अपने परायों का भेद ही खत्म कर दिया. दुनिया की कई मांएं होंगी, जो ममता के मायने सिर्फ मदर टेरेसा से तय करती होंगी.
पैबंद लगी साड़ी और टेढ़े मेढ़े हाथ पैर वाली इस महिला की बहादुरी उस वक्त सामने आई, जब इसने 1942 में जंग में धधकते बेरूत में घुस कर वहां फंसे 37 बच्चों को बाहर निकाला. बारह लोगों से शुरू हुआ मिशन हजारों लोगों का मिशन बन गया है. रेड क्रॉस की तरह नीली पट्टी वाली सफेद साड़ी पूरी दुनिया में पहचानी जाने लगी है. एक सौ पैंतीस देशों में ऑर्डर खुल गए और हजारों महिलाएं सेवा भाव में जुड़ गईं.

सवाल भी उठे. कभी मदर टेरेसा ने खुद अपने यकीन पर सवाल उठाए, जिसे अध्यात्म के अंधकार का नाम दिया गया, तो कभी उन्हें मिलने वाले पैसों पर दुनिया ने सवाल उठाए कि उन्हें कौन पैसे देता है. क्यों देता है. मदर टेरेसा ने इनका जवाब नहीं दिया. अपने ईश्वर पर छोड़ दिया. बीच बीच में नोबेल का शांति सम्मान और भारत रत्न जैसे पुरस्कार भी मिले, लेकिन मदर टेरेसा के लिए इनके कोई मायने नहीं थे.

गुजरने के बाद मदर टेरेसा को संत बनाने का सिलसिला शुरू हुआ. नियमों के तहत उनसे जुड़े दो चमत्कार साबित होने पर उन्हें संत का दर्जा दे दिया जाएगा. एक चमत्कार साबित हो चुका है, दूसरे का इंतजार है. लेकिन क्या जादुई मदर टेरेसा को क्या सचमुच संत जैसी किसी पदवी से दिलचस्पी होगी.
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08:24:02 am 26 - Aug - 2010
पुरातात्विक टीम ने डाला डेरा, खुदाई शुरू
बस्ती : जिले के नगर थाना क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक महुआ डाबर गांव में पुरातात्विक टीम ने डेरा डाल दिया है। तीन दिन तक सर्वे के बाद सोमवार से टीम ने यहां खुदाई शुरू करा दी है। बड़ी संख्या में मजदूर टीम की देखरेख में खुदाई कर रहे हैं। बता दें कि जनपद का महुआ डाबर गांव स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का साक्षी है। घटना के संबंध में उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार 10 जून 1857 को यहां के ग्रामीणों ने गांव से गुजर रहे लेफ्टिनेंट लिण्डसे, लेफ्टिनेंट थामस, लेफ्टिनेंट इंग्लिश, लेफ्टिनेंट रिची, सार्जेन्ट एडवर्ड, लेफ्टिनेंट काकल व सार्जेन्ट बुशर को घेरा। सातों को हत्या की नीयत से जमकर मारा। इस घटना में छह अंग्रेज अफसर तो मर गए मगर सार्जेन्ट बुशर किसी तरह जान बचाकर निकल गया। वह सीधा अपने कैम्प पहुंचा और स्थिति से अवगत कराया। घटना से आग बबूला हुई अंगे्रजी हुकूमत ने इस गांव को नेस्तनाबूद कर देने का फरमान जारी कर दिया। अंग्रेजी फौज ने विलियम पेपे के नेतृत्व में 20 जून की रात गांव को घेर कर आग के हवाले कर दिया। गांव धू-धू कर जल उठा। अंग्रेजी हुकूमत ने इतना ही नहीं किया। गांव का अस्तित्व मिटाने के लिए देश के नक्शे, सरकारी रिपोर्ट व गजेटियर से उसका नाम ही मिटा डाला। इस घटना के बाद गांव में जो लोग बचे वे इधर-उधर जाकर बस गए। आजादी के बाद भी यह गांव अतीत में ही खोया रहा। यह गांव तब फिर से संज्ञान में आया जब गांव के निवासी मुंबई में बसे अब्दुल लतीफ अपने माटी से जुड़ने के लिए 1994 में यहां आए। तब गांव पर उनका शोध शुरू हुआ। मशक्कत से गांव का नक्शा हासिल किया और यह गांव स्वतंत्रता आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाला है साबित करने के लिए जी जान से जुट गए। आखिर सोलह वर्ष की मेहनत रंग लाई। पुरातत्व विभाग एक वर्ष भर से यहां का गहन अध्ययन कर रहा था। 11 जून 10 को खुदाई के लिए जिलाधिकारी को पत्र भेजा। प्रशासनिक संस्तुति के बाद पुरातत्व विभाग लखनऊ विश्र्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर अनिल कुमार के नेतृत्व में तीन सदस्यीय टीम ने गांव में डेरा डाल दिया। तीन दिनों तक अध्ययन किया और सोमवार से गांव की खुदाई शुरू करा दी। यह खुदाई पन्द्रह दिनों यानी 30 जून तक चलेगी। कलवारी प्रतिनिधि के अनुसार श्री कुमार ने कहा कि लक्ष्य हासिल करने तक खुदाई जारी रहेगी। इसकी रिपोर्ट भारत सरकार को दी जाएगी।
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07:33:57 am 15 - Jun - 2010
साहित्य, संगीत व रंगकर्म में योगदान के लिए सम्मान
प्रतिनिधि, गोरखपुर : विश्व कवि, नोबल पुरस्कार से सम्मानित गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर की 150 वीं जयंती के अवसर पर आधारशिला संस्था द्वारा साहित्य, संगीत व नाट्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वालों को सम्मानित किया गया। मंगलवार को प्रेसक्लब के सभागार में आयोजित सम्मान समारोह में युवा रचनाकार उमेश पटेल श्रीश को संस्था के सचिव दीपक चक्रवर्ती निशांत ने, गायिका श्रीमती उमा दत्ता को संस्था के अध्यक्ष होमियोपैथ चिकित्सक डा. रूप कुमार बनर्जी ने तथा रंगकर्म के क्षेत्र में योगदान के लिए अजीत प्रताप सिंह को वरिष्ठ बंगला रंगकर्मी तमाल आचार्या ने स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया। सम्मान समारोह का शुभारंभ अतिथियों द्वारा गुरूदेव के चित्र पर माल्यार्पण तथा श्रीमती प्रतिमा चक्रवर्ती निशांत के गाये गीत से हुआ। इस मौके पर मुख्य अतिथि डा. रूप कुमार बनर्जी ने कहा कि गुरू रवीन्द्र नाथ टैगोर की सभी रचनाएं जीवन मूल्यों को परलक्षित करती हैं तथा उनके भीतर छीपे गूढ़ सारतत्वों को आमजन तक पहुंचाती है। उन्होंने कहा कि गुरूदेव में साहित्य के अतिरिक्त अध्यात्म, दर्शन, प्रकृति, कला एवं संस्कृति के प्रति संवेदनशीलता देखते ही बनती है। इस अवसर वरिष्ठ रंगकर्मी तमाल आचार्या, पत्रकार कृष्ण गोपाल, संजय वर्मा, संस्था के प्रवक्ता डा. राजेश चन्द्र गुप्त ने भी अपने विचार रखे। स्वागत व आभार ज्ञापन संस्था के सचिव दीपक चक्रवर्ती निशांत तथा संचालन रंगकर्मी प्रेमनाथ ने किया।
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08:37:24 am 12 - May - 2010
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